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राह में चलते हुए मेरा बचपन कहीं खो गया।

साथ ही था, जाने कब कहाँ पीछे छूट गया।

मुड़ के देखा तो कोई नहीं था वहां।

जाने किस बात पर वो मुझ से रूठ गया।

वो खाली मैदान अब खाली नहीं रहे।

ना बारिश के बाद अब वहां कोई तितलियां पकड़ता है।

वो कटी पतंग भी अब उस गली में नहीं गिरती।

न कोई अब उसके लिए झगड़ता है।

न वो पुराने खंडहर सी दुकान है।

न उसमे रखे रंग बिरंगे कंचे।

न कोई अब उन से खेलता है।

न रहे उनके लिए वो ज़िद करते बच्चे।

बेसुध पड़े उस डंडे को देख कर।

वो नन्ही गिल्ली याद आ गई।

कभी जान से भी ज्यादा प्यारे थे ये दोनो।

अब इनको भी वक़्त की दीमक खा गयी।

अब ना किसी घर में कच्चा आंगन है।

न कोई उसमे रेत के घर बनाता है।

बारिश तो आज भी होती है वहाँ।

पर अब कहाँ कोई उसमे नहाता है।

अमियां आम हो कर खुद ही गिर जाती हैं।

कोई नहीं जो उन्हें पत्थर से गिरा दे।

पके बेरों से लदी बेरी खड़ी है इंतेज़ार में,

कोई तो आये, और बस ज़रा सा हिला दे।

मैं भी लौट आया हूँ अब वहां से।

दिल में चुभन, आँखें भी नम हैं ।

जवानी और बुढ़ापा भी साथ छोड़ जाएंगे ऐसे ही।

थोड़ा सा और जी लूँ, वक़्त बहुत कम है।

– अंतर्मन

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About the Author

Dr Ajeet Singh Shekhawat

A dentist by profession and a poet by choice. A humble and contented human with a great sense of emotions which gets reflected in his intense poetry. He says

ख्वाहिशें नहीँ हैं उसकी, तभी शायद रात भर सो लेता है ।

आदमी सच्चा है बहुत, सुना है भीड़ में भी रो लेता है ।

Ajeet shares his inside out through his poetry at Antarmann

2 responses to “Bachapan- बचपन”

  1. […] You may also Like- बचपन […]

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