वो पल जो मैंने खो दिए , रोटी की आज़त में ।

रूठे से मुझसे मिलते हैं , जब शाम होती है।।

परिंदा जो उड़ के सुबहो को दाना कमाने जाता है ।

ज़ख़्मी बदन आता है वो , जब शाम होती है।।

दरिया को भी अब देखकर मैं खौफ खाता हूँ ।

मेरा सूरज निगल जाता है वो , जब शाम होती है।।

वो शायर है, दिन में महफिलों में शेर पढता है ।

वो टूटा है, बिखर जाता है, जब शाम होती है ।।

लगता था जिसको मौत क्या ले जायेगी उसका ।

क्यों डरता है? सहम जाता है , ज़िन्दगी की जब शाम होती है ।।


-मुसाफिर


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13 responses to “जब शाम होती है”

  1. बहुत अच्छी
    सच में दिल छू गयी

  2. Lovely… Amazing

  3. Kya kahoo kuch kehna hai mushkil … teri har nazm asar kar jaati hai.. jab shaam hoti hai..

    1. Ha ha ha thanks vismita.

  4. Good one Bhai..

    1. Thanks Surabh Mishra

  5. Gulzar jaisa feel aata hai isme. Very nicely composed

  6. […] जब शाम होती है […]

  7. […] जब शाम होती है […]

  8. […] जब शाम होती है […]

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