सहकर्मी मित्र को समर्पित

अजब सा नाता हम दोनों का।
ढाल भी तुम तलवार भी तुम।
माांझी से तुम इन लहरों में।
और कभी मझधार भी तुम।

विकल हृदय से भोर भए तुम।
चाांद की शीतल धार भी तुम।
रक्त तप्त तुम रवि सरीखे।
और कभी मल्हार भी तुम।

गुरु तुम हीं सह कर्मी तुम।
कभी कभी हठधर्मी तुम।
ह्रदय ग्राही तुम गीत सरीखे।
और ग़ज़ल की नरमी तुम।

अभिमन्यु से कुरुक्षेत्र में।
भीषम सा विस्तार भी तुम।
कृष्ण तुल्य तुम मन में बसते।
अर्जुन की हुंकार भी तुम।

सखा वियोगी इस बेला में।
अश्रु भी, मुस्कान भी तुम।
हृदय को हर्षित करते मन में।
भावों का तूफ़ान भी तुम।

प्रियवर तुम को खोकर जाना।
एक अलग एहसास थे तुम।
स्थान, समय और ऋतु पर्यंत थे।
जीवन का उल्लास थे तुम।

साथी मेरे खास थे तुम।
साथी मेरे खास थे तुम।

-“मुसाफ़िर”

One response to “सहकर्मी मित्र: एक अनोखा रिश्ता”

  1. Truly Commendable. The bonding between colleagues cannot be expressed better than this.

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