वो पल जो मैंने खो दिए , रोटी की आज़त में ।
रूठे से मुझसे मिलते हैं , जब शाम होती है।।
परिंदा जो उड़ के सुबहो को दाना कमाने जाता है ।
ज़ख़्मी बदन आता है वो , जब शाम होती है।।
दरिया को भी अब देखकर मैं खौफ खाता हूँ ।
मेरा सूरज निगल जाता है वो , जब शाम होती है।।
वो शायर है, दिन में महफिलों में शेर पढता है ।
वो टूटा है, बिखर जाता है, जब शाम होती है ।।
लगता था जिसको मौत क्या ले जायेगी उसका ।
क्यों डरता है? सहम जाता है , ज़िन्दगी की जब शाम होती है ।।
-मुसाफिर
PC- Google Images

Leave a comment